सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म दोषी की सजा घटाई, कहा- कम उम्र और सुधार की संभावना पर किया विचार

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। करीब 10 साल पुराने दुष्कर्म के एक मामले में दोषी की सजा को घटाने का निर्णय लिया गया है। इसकी वजह न्यायाधीशों ने सुधार की गुंजाइश को बताया है। दोषी की तरफ से ही शीर्ष न्यायालय में याचिका दाखिल की गई थी। वहीं, अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि उसका आचरण जेल में अच्छा रहा है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई की थी।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, "पुरुष-प्रधान सोच की बेड़ियों को तोड़ने के लिए सामाजिक और मानसिक स्तर पर काफी बदलाव आने के बावजूद, इस तरह की घटनाएं आज भी बिना किसी डर या शर्म के लगातार हो रही हैं।
पीठ ने आगे कहा, "कानून में पिछले कुछ वर्षों में कई तरह के सुधार और संशोधन किए गए हैं, और भले ही उनका कुछ हद तक सकारात्मक असर पड़ा हो, लेकिन ऐसे अपराधों को जड़ से खत्म करने की तत्परता को थोड़ा भी कम नहीं किया जा सकता. हमें तब तक प्रयास जारी रखने होंगे जब तक कि ये घटनाएं केवल इतिहास का हिस्सा न बन जाएं और पूरा समाज इन्हें नफरत की नजर से न देखने लगे।
पीठ ने अपराध की गंभीरता को बरकरार रखते हुए, 2016 के सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए याचिकाकर्ता की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया. पीठ ने कहा, "ऊपर चर्चा किए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए और दोषी-अपीलकर्ता के पक्ष में पहले नोट किए गए कारणों पर विचार करते हुए, हम उसकी सजा को बदलकर छूट के लाभ के साथ 20 साल करना उचित समझते हैं. इस प्रकार, याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है।
अपने फैसले में, शीर्ष अदालत ने 'आनुपातिकता के सिद्धांत' का हवाला दिया और कहा कि सजा ऐसी होनी चाहिए जो अपराध को रोकने, समाज की सुरक्षा करने और दोषी के सुधरने की संभावना के बीच एक सही संतुलन बनाए रखे. पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि इस मामले में दोषी का पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है. जब यह अपराध हुआ तब उसकी उम्र केवल 25 साल थी. इतनी कम उम्र होने के कारण उसके सुधरने की पूरी गुंजाइश है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि इस व्यक्ति का सुधरना नामुमकिन है. साथ ही, सरकार दोषी की इस दलील को भी नहीं काट सकी कि जेल में बिताए गए पिछले लगभग 10 सालों (छूट मिलाकर) के दौरान उसका आचरण और व्यवहार बेहद अच्छा रहा है।
पीठ ने कहा कि चाहे जो भी हो, वह इस तथ्य से आंखें नहीं मूंद सकती कि यह अपराध, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, बेहद जघन्य है और यह न केवल पीड़िता के खिलाफ बल्कि पूरे समाज के खिलाफ है. पीठ ने कहा कि यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि जिस धारा (आईपीसी की धारा 376D) के तहत अपीलकर्ता को सजा सुनाई गई है, उसे 2013 के आपराधिक कानून संशोधन (2013 का अधिनियम 13) के जरिए बदला गया था. यह सख्त कानून राजधानी की सड़कों पर हुई भयावह 'निर्भया' घटना के बाद लाया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने 2016 में दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में दोषी करार दिए गए व्यक्ति की उम्रकैद की सजा सोमवार को घटाकर 20 साल जेल की सजा में तब्दील कर दी। शीर्ष अदालत ने दोषी व्यक्ति को छूट का लाभ देते हुए कहा कि उसमें सुधार की गुंजाइश है, क्योंकि उसने यह अपराध तब किया था, जब वह महज 25 साल का था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस बात पर गौर किया कि याचिकाकर्ता (दोषी व्यक्ति) का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जेल में उसका आचरण भी अच्छा रहा है। पीठ ने कहा, 'मौजूदा मामले में दोषी याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है; अपराध के समय उसकी उम्र महज 25 साल थी; कम उम्र को देखते हुए माना जा सकता है कि उसमें सुधार की गुंजाइश है।'
अच्छे आचरण का जिक्र
उसने कहा, 'राज्य सरकार ने न तो रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी पेश किया है, जिससे साबित हो सके कि उसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है। न ही उसने याचिकाकर्ता की इस दलील का खंडन किया है कि दोषसिद्धि के बाद लगभग दस वर्षों की अवधि में उसका आचरण अच्छा रहा है।'
क्या मिली थी सजा
निचली अदालत ने व्यक्ति को उसके शेष जीवनकाल के लिए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और उसे पीड़िता को 25,000 रुपये का जुर्माना देने का भी निर्देश दिया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।
2 लोगों पर थे आरोप
पीड़िता ने राष्ट्रीय राजधानी के आईपी एस्टेट पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसने दिल्ली रेलवे स्टेशन से रात में रिक्शा लिया था, लेकिन चालक उसे उसके घर छोड़ने के बजाय एक सुनसान जगह पर ले गया, जहां एक व्यक्ति पहले से मौजूद था। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि दोनों व्यक्तियों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। शिकायत के आधार पर 27 सितंबर 2016 को प्राथमिकी दर्ज की गई थी।











