मध्य प्रदेश

जब वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नवीन आनंद जोशी ने पूछे समय के प्रश्न, डॉ. राजेश कुमार मिश्र ने रखी संस्कृति और संस्कार की दिशा

दो मनीषियों का संवाद : तकनीक, संस्कृति, नारी-शक्ति और युवा भारत पर एक सार्थक विमर्श

तकनीकी क्रांति के इस युग में जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल माध्यम और वैश्विक संचार ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति प्रदान की है, वहीं भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और जीवन-संस्कारों के संरक्षण का प्रश्न भी उतनी ही गंभीरता से हमारे सामने खड़ा है। सूचना के विस्तार के साथ-साथ आत्मबोध, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना को कैसे सुरक्षित रखा जाए—यह आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

इन्हीं ज्वलंत प्रश्नों पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नवीन आनंद जोशी ने भारतीय ज्ञान-परंपरा के विद्वान, नव नालंदा महाविहार (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) के सहायक प्रोफेसर तथा ग्लोबल संस्कृत फोरम एवं ग्लोबल विदुषी समूह के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राजेश कुमार मिश्र से विस्तारपूर्वक संवाद किया। यह चर्चा केवल प्रश्नोत्तर नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और राष्ट्र के भविष्य पर दो चिंतकों के बीच एक गंभीर वैचारिक विमर्श बन गई।

प्रश्न : तकनीक के युग में क्या हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो रहे हैं?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

आज दुनिया अभूतपूर्व तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यम हैं, दूसरी ओर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण की चिंता भी बढ़ रही है। क्या हमारी अपनी परंपरा और भारतीय ज्ञान-व्यवस्था इस चुनौती का उत्तर देने में सक्षम है?

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

नई तकनीक ने मनुष्य की क्षमताओं का विस्तार किया है, लेकिन यदि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कमजोर हो जाएँ तो विकास की ऊँचाइयाँ भी स्थायी नहीं रह सकतीं। संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले मूल्य हैं। आज की पीढ़ी के पास जानकारी बहुत है, किंतु गहराई अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक को अपनाते हुए भी हम अपने नैतिक मूल्यों, विवेक और सांस्कृतिक चेतना को सुरक्षित रखें। वास्तविक प्रगति वही है जिसमें ज्ञान के साथ चरित्र का भी विकास हो।

प्रश्न : नारी-शक्ति को आप अपने अभियान का केंद्र क्यों मानते हैं?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

आपके लगभग प्रत्येक अभियान में महिलाओं की सक्रिय भूमिका दिखाई देती है। इसके पीछे आपकी मूल सोच क्या है?

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

माँ ही बच्चे की पहली शिक्षिका होती है। परिवार का संस्कार उसी से प्रारंभ होता है। यदि नारी शिक्षित, संस्कारित और जागरूक होगी तो पूरा परिवार संस्कारित होगा और समाज भी सुदृढ़ बनेगा। इसलिए हमने महिलाओं को केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।

मैं देश की युवा बेटियों और बहनों से कहना चाहता हूँ कि ज्ञान को अपना सबसे बड़ा सामर्थ्य बनाइए। आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए और परिवार तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनिए।

प्रश्न : ग्लोबल विदुषी समूह की स्थापना का मूल उद्देश्य क्या था?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

आज ग्लोबल विदुषी समूह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। इसकी स्थापना के पीछे आपकी मूल प्रेरणा क्या रही?

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

हमने अनुभव किया कि भारतीय ज्ञान-परंपरा केवल विश्वविद्यालयों या संस्थानों तक सीमित होती जा रही है। आवश्यकता थी कि यह घर-घर पहुँचे। इसी उद्देश्य से ऐसा मंच बनाया गया जहाँ महिलाएँ केवल श्रोता न रहें, बल्कि वक्ता, शोधकर्त्री, प्रशिक्षक और नेतृत्वकर्ता बनकर सामने आएँ।

हमारा विश्वास है कि यदि परिवार मजबूत होगा तो समाज और राष्ट्र भी मजबूत होगा। यही विचार ग्लोबल विदुषी समूह की स्थापना का आधार बना।

प्रश्न : आज के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

आज की युवा पीढ़ी अत्यंत प्रतिभाशाली है, लेकिन अक्सर उसके सामने दिशा का संकट दिखाई देता है। आप इसे किस प्रकार देखते हैं?

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

मैं युवाओं को दिशाहीन नहीं मानता। उनमें अद्भुत ऊर्जा, साहस और क्षमता है, लेकिन उन्हें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। सफलता का अर्थ केवल पद, प्रतिष्ठा या आर्थिक उपलब्धि नहीं है। वास्तविक सफलता वही है जो समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो।

युवाओं से मेरा आग्रह है कि वे स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछें—वे किस उद्देश्य के लिए आगे बढ़ रहे हैं। यदि प्रगति अपनी सांस्कृतिक पहचान और मानवीय मूल्यों के साथ होगी, तभी वह स्थायी और सार्थक बनेगी।

प्रश्न : आज प्रशिक्षण और प्रशिक्षकों की गुणवत्ता पर आपका क्या दृष्टिकोण है?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

आज अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रम और संस्थाएँ कार्य कर रही हैं। ऐसे समय में एक आदर्श प्रशिक्षक की पहचान क्या होनी चाहिए?

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

सच्चा प्रशिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने जीवन से प्रेरणा देता है। वह अपने आचरण से शिक्षा को सार्थक बनाता है। हमें ऐसे मार्गदर्शकों की आवश्यकता है जो शास्त्रों के मर्म को समझते हों, समय के अनुरूप उसकी व्याख्या कर सकें और स्वयं उसे जीवन में उतारते हों।

अभिभावकों और शैक्षणिक संस्थानों का भी दायित्व है कि वे ऐसे प्रशिक्षकों को पहचानें, सम्मान दें और उन्हें समाज के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत करें।

प्रश्न : ग्लोबल संस्कृत फोरम और ग्लोबल विदुषी समूह की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या हैं?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

आपके दोनों संगठनों ने देश-विदेश में व्यापक कार्य किया है। उनकी प्रमुख उपलब्धियों के बारे में बताइए।

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

हमने विश्व के अनेक देशों में अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रांतीय, क्षेत्रीय और जिला स्तर तक संगठनात्मक इकाइयों का विस्तार किया है। हजारों वेबिनार, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ, सम्मेलन तथा वैचारिक कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।

‘अस्मिता इंटरनेशनल’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। हमारा सबसे बड़ा उद्देश्य केवल कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि विद्यालयों, महाविद्यालयों, महिला समूहों और ग्रामीण समाज तक पहुँचकर भारतीय संस्कृति और संस्कारों का जन-जागरण करना है। यह एक संगठन नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक आंदोलन है।

प्रश्न : अभिभावकों और युवाओं के लिए आपका संदेश क्या है?

डॉ. नवीन आनंद जोशी :

अंत में आप देश के अभिभावकों और युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?

डॉ. राजेश कुमार मिश्र :

अभिभावकों से मेरा विनम्र आग्रह है कि वे अपने बच्चों को केवल सफल बनाने का प्रयास न करें, बल्कि उन्हें संस्कार, संवेदना, अनुशासन और सहानुभूति का भी पाठ पढ़ाएँ।

युवाओं से कहना चाहूँगा कि अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और जड़ों पर गर्व करें। बड़े लक्ष्य निर्धारित करें, आधुनिकता को अपनाएँ, लेकिन मानवता, करुणा और भारतीय जीवन-मूल्यों को कभी न छोड़ें। यही स्थायी सफलता का मार्ग है।

समापन

संवाद के अंत में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नवीन आनंद जोशी ने कहा—

“राजेश जी, आपके विचार केवल प्रेरक ही नहीं, बल्कि आज के समय के लिए मार्गदर्शक भी हैं। संस्कृति और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने की जो दृष्टि आपने प्रस्तुत की है, वह समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उपयोगी है।”

इस पर डॉ. राजेश कुमार मिश्र ने विनम्रता से उत्तर दिया—

“नवीन जी, आपके साथ यह संवाद मेरे लिए अत्यंत सम्मान और सीख का अवसर रहा। पत्रकारिता के माध्यम से समाज और संस्कृति के प्रति आपका समर्पण प्रेरणास्पद है। आशा है कि ऐसे संवाद समाज में सकारात्मक चिंतन और सांस्कृतिक जागरण का माध्यम बनेंगे।”

यह संवाद स्पष्ट करता है कि तकनीक और आधुनिकता का विरोध नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान-परंपरा और मानवीय मूल्यों के साथ उनका संतुलित समन्वय ही भविष्य के भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है।

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