सोमनाथ अमृत महोत्सव 2026: 75 वर्ष पूरे होने पर भव्य आयोजन, पीएम मोदी हुए शामिल

सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर में आज भव्य सोमनाथ अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए हैं। इस दौरान मंदिर में कई तरह के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। मंदिर परिसर में विशेष पूजा, कुंभाभिषेक और ध्वजारोहण समारोह का आयोजन किया गया। सोमनाथ मंदिर का शिव पुराणों में भी विशेष महत्व बताया गया है। बता दें कि यह अमृत महोत्सव मंदिर के उद्घाटन के 75 वर्ष पूरे होने के शुभ अवसर पर मनाया जा रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं सोमनाथ अमृत महोत्सव क्या है साथ ही जानें इस मंदिर की पुराणों में क्या महिमा बताई गई है।
सोमनाथ अमृत महोत्सव क्या है ?
सोमनाथ मंदिर को सरदार वल्लभभाई पटेल ने वर्ष 1951 में पुनर्स्थापित किया था। साल 2026 में इस मंदिर को पुनर्स्थापित हुए पूरे 75 वर्ष हो चुके हैं। इसलिए यहां अमृ महोत्सव का आयोजन किया गया है। गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर में कई बार आक्रमण किए गए लेकिन, बार बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। भारत को आजादी मिलने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पहल कर इसका पुनर्निर्माण कराया था। इसका उद्घाटन भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया था। बात करें अमृत महोत्सव की तो अमृत के एक नाम सोम भी है और सोमनाथ का संबंध भी सोम से है यानी चंद्रमा से। शिवपुराण में इससे संबंधित कथा का भी वर्णन किया गया है। गणेशजी जब कुबेर का अभिमान नष्ट कर अपने घर कैलाश पर्वत पर लौट रहे थे उस समय चंद्रमा की रोशनी से पूरा कैलाश पर्वत चमक रहा था। तभी गणेशजी की सवारी मूषक के सामने से एक सर्प निकला तो वह डर गया और उस पर विराजमान गणेशजी अपना संतुलन खो कर गिर पड़े।
तभी चंद्रमा ने यह सब होते देखा और वह जोर जोर से हंसने लगें। गणेशजी चंद्रमा पर बहुत क्रोधत हो गए ही वह उनकी मदद करने की जगह उनका उपहास कर रहे हैं। गणेशजी ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि तुम्हें जिस चांदनी का गुरुर है आज के बाद तुम उसे खो दोगे और इस तरह चंद्रमा को क्षय रोग हो गया। चंद्रमा की सारी चांदनी चली गई। चंद्रमा ने गणेशजी से माफी मांगी तब गणेशजी का क्रोध शांत हुए तो उन्होंने कहा कि मैं श्राप को वापस नहीं ले सकता हूं लेकिन, तुम भगवान शिव की आराधना करो वह ही तुम्हें जीवन दान दे सकते हैं। जब चंद्रमा ने गुजरात में बालू से एक शिवलिंग बनाया और वहां भगवान शिव की आराधना की। चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें जीवनदान दे दिया जहां चंद्रमा को जीवनदान मिला था वह स्थान सोमनाथ है। बता दें कि 12 ज्योतिर्लिंगों में से सोमनाथ को ही सबसे पहले ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यहां चंद्रदेव को कष्ट दूर हुए हैं इसलिए इस स्थान का नाम सोमनाथ पड़ा यानी चंद्रदेव के नाथ।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास
1026 ई में सोमनाथ मंदिर पर सबसे खतरनाक हमला महमूद गजनवी ने किया था। महमूद गजनवी ने मंदिर को बुरी तरह से लूटकर पूरा खंडहर बना दिया था। इसके बाद 1297 ई में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने इस मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इसके बाद 1395 और 1412 में भी मंदिर पर हमला किया गया। औरंगजेब ने भी 1665 और वर्ष 1706 के बीच दो बार मंदिर पर हमला किया और मंदिर परिसर में पूजा पाठ पर रोक लगा दी। 18वीं सदी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मूल मंदिर से कुछ दूरी पर एक नया मंदिर बनवाया। इसके बाद देश आजाद होने पर वर्ष 1951 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।











