
रोहतक.
हेपेटाइटिस-सी जैसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए अब मरीजों को बार-बार पीजीआइएमएस के चक्कर नहीं लगाने पड़ रहे हैं। पीजीआइएमएस के गैस्ट्रोएंटरोलाजी विभाग ने पूरे प्रदेश के विशेषज्ञ चिकित्सकों को जोड़कर हेपेटाइटिस सी फ्री हरियाणा नाम से एक व्हाट्सएप नेटवर्क तैयार किया है।
इस नेटवर्क के जरिए मरीजों की जटिल चिकित्सा संबंधी समस्याओं का समाधान तत्काल किया जाता है और उन्हें अपने ही जिले के सरकारी अस्पताल में उपचार उपलब्ध कराया जाता है। इस पहल से प्रदेश के चार मेडिकल कालेजों और 22 सरकारी सिविल अस्पतालों के कुल 27 गैस्ट्रो विशेषज्ञ चिकित्सक जुड़े हुए हैं। प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है, जो मरीजों की स्क्रीनिंग, जांच, उपचार और विशेषज्ञ सलाह की व्यवस्था सुनिश्चित करता है। जरूरत पड़ने पर डाक्टर व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से केस साझा करते हैं और तुरंत उपचार की रणनीति तय कर लेते हैं। पीजीआइएमएस के गैस्ट्रोएंटरोलाजी विभागाध्यक्ष एवं नेशनल और स्टेट स्टीयरिंग कमेटी के सदस्य डा. प्रवीण मल्होत्रा के अनुसार वर्ष 2013 से हेपेटाइटिस-सी उन्मूलन अभियान लगातार चलाया जा रहा है।
पहले मरीज डर और जागरूकता की कमी के कारण अस्पताल नहीं पहुंचते थे, लेकिन अब स्क्रीनिंग बढ़ने और मुफ्त इलाज की सुविधा मिलने से अधिक मरीज समय रहते सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि नरवाना, फतेहाबाद, हिसार, सिरसा, जींद और कैथल जैसे जिलों में अपेक्षाकृत अधिक मरीज मिले हैं। हाल के वर्षों में पलवल और नूंह (मेवात) से भी मामलों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। मरीज मिलने पर केवल उसका ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार की स्क्रीनिंग भी की जाती है, ताकि संक्रमण की कड़ी को समय रहते रोका जा सके।
एक ही छत के नीचे पूरा इलाज
पीजीआइएमएस में हेपेटाइटिस-सी मरीजों के लिए ऐसा माडल विकसित किया गया है, जहां एक ही स्थान पर सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसमें विशेषज्ञ चिकित्सक, काउंसलर, डेटा आपरेटर, दवा वितरण, फाइब्रोस्कैन, एंडोस्कोपी, भर्ती सुविधा और नियमित फॉलोअप शामिल हैं। जरूरत पड़ने पर परिवार के अन्य सदस्यों की जांच और टीकाकरण भी किया जाता है। यह पूरी व्यवस्था निशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। डा. मल्होत्रा के अनुसार समय पर जांच और नियमित दवा से 95 प्रतिशत तक मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। बीमारी की शुरुआती पहचान होने पर लीवर सिरोसिस और लीवर कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं से बचाव संभव है, जिससे भविष्य में लीवर प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांट) की आवश्यकता भी काफी हद तक टाली जा सकती है।
नशा और काला पीलिया बन रहे बड़ा खतरा
काला पीलिया, मोटापा और नशे का गठजोड़ बिगाड़ रहा लीवरविशेषज्ञों के अनुसार काला पीलिया (हेपेटाइटिस), मोटापा और नशा मिलकर लीवर को तेजी से नुकसान पहुंचाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में चिन्हित हेपेटाइटिस-सी मरीजों में लगभग 60 प्रतिशत पुरुष नशे से जुड़े पाए गए हैं। इसलिए इस अभियान को नशा मुक्ति कार्यक्रम से भी जोड़ा गया है। रक्तदान शिविरों, गर्भवती महिलाओं की अनिवार्य जांच, एंजियोग्राफी से पहले की स्क्रीनिंग और अन्य नियमित स्वास्थ्य जांचों के दौरान भी हेपेटाइटिस-सी की पहचान की जा रही है। इससे पहले जहां मरीज बीमारी की अंतिम अवस्था में अस्पताल पहुंचते थे, वहीं अब शुरुआती स्तर पर ही संक्रमण पकड़ में आ रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया प्रदेश के मॉडल
डॉ. प्रवीण मल्होत्रा का कहना है कि पीजीआइएमएस का यह वन-स्टॉप हेपेटाइटिस केयर माडल राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाया गया है। वर्तमान में हरियाणा के अलावा राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से भी मरीज उपचार के लिए यहां पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि समय पर जांच, नियमित दवा और जागरूकता ही हेपेटाइटिस-सी को खत्म करने का सबसे प्रभावी तरीका है।











