भोपाल मास्टर प्लान पर किसानों का विरोध, 66 गांवों की जमीन बचाने आज निकालेंगे पदयात्रा

भोपाल
किसानों का आरोप है कि प्रस्तावित प्लान में 66 गांवों की कृषि भूमि को रिवरफ्रंट, फॉरेस्ट, ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने से हजारों किसानों की खेती और आजीविका पर असर पड़ सकता है।
बड़ा तालाब के आसपास की कृषि भूमि का भू-उपयोग बदलने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए किसान गुरुवार को मुगालिया छाप से पदयात्रा निकालकर नगर तथा ग्राम निवेश (टीएंडसीपी) के संयुक्त संचालक कार्यालय पहुंचेंगे।
यहां वे लिखित आपत्तियां दर्ज कराएंगे। किसानों की मांग है कि कृषि भूमि का लैंडयूज पहले की तरह कृषि ही रखा जाए और किसी भी बदलाव से पहले संबंधित गांवों में ग्रामसभाएं कराकर किसानों की सहमति ली जाए।
बड़ा तालाब के नाम पर कृषि भूमि का लैंडयूज बदलने का आरोप
किसान अनोखी सिंह पटेल का कहना है कि बड़ा तालाब के संरक्षण के नाम पर ग्रामीण क्षेत्र की कृषि भूमि का भू-उपयोग बदला जा रहा है।
किसान इन जमीनों पर वर्षों से खेती कर रहे हैं और परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर है। उनका कहना है कि यदि जमीन आरक्षित श्रेणियों में शामिल हो गई, तो खेती और भविष्य में जमीन के उपयोग को लेकर अनिश्चितता बढ़ेगी।
1995 के मास्टर प्लान में कृषि उपयोग का प्रावधान
किसानों के मुताबिक, वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में इन जमीनों का लैंडयूज कृषि था। बाद में तैयार किए गए वर्ष 2031 के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में भी कृषि उपयोग का प्रावधान रखा गया था। हालांकि, वह मास्टर प्लान निरस्त हो गया।
किसान भविष्य को लेकर चिंतित
किसानों का आरोप है कि मौजूदा ड्राफ्ट में बड़ा तालाब के आसपास की कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव का प्रस्ताव किया गया है। इसी वजह से किसान अपनी जमीन के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
BIZ-1 और BIZ-2 जोन हटाने की मांग
किसान चाहते हैं कि उनकी कृषि भूमि का उपयोग खेती के लिए ही सुरक्षित रखा जाए। अनोखी सिंह पटेल के मुताबिक, किसानों के पास आजीविका का प्रमुख साधन खेती है। इसलिए उन्होंने भोजताल संरक्षण जोन-1 (BIZ-1) और जोन-2 (BIZ-2) को हटाने और कृषि भूमि का लैंडयूज कृषि ही रखने की मांग की है।
ग्रामसभा में सहमति के बाद ही हो बदलाव
किसानों का कहना है कि वर्ष 2031 के मास्टर प्लान की प्रक्रिया के दौरान उन्हें आश्वासन दिया गया था कि नए ड्राफ्ट को तैयार करते समय पंचायतों से सहमति ली जाएगी। उनका आरोप है कि मौजूदा ड्राफ्ट में गांवों की सहमति नहीं ली गई।
किसान चाहते हैं कि पहले 66 गांवों में ग्रामसभाएं कराई जाएं, आपत्तियों पर चर्चा हो और किसानों की बात सुनने के बाद ही भू-उपयोग में बदलाव पर फैसला लिया जाए।











