तुपकी’ की सलामी और भक्ति भाव के बीच संपन्न हुआ बस्तर का प्रसिद्ध गोंचा पर्व

रायपुर
प्रसिद्ध गोंचा पर्व छत्तीसगढ़ के बस्तर (जगदलपुर) अंचल में मनाया जाने वाला एक अनूठा और ऐतिहासिक सांस्कृतिक एवं धार्मिक उत्सव है। यह भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से जुड़ा है और इसकी मुख्य विशेषता तुपकी, गोंचा फल तथा 600 साल पुरानी परंपरा है।
बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक प्रसिद्ध गोंचा पर्व आज भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा रथयात्रा के साथ श्रद्धा और उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भगवान बलभद्र जनकपुरी (गुंडिचा मंदिर) से रथ पर सवार होकर अपने मुख्य मंदिर लौटे।
बाहुड़ा गोंचा के अवसर पर वन मंत्री केदार कश्यप, बस्तर सांसद महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव, चित्रकोट विधायक विनायक गोयल सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने रथयात्रा में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना की। उन्होंने क्षेत्र की सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली के लिए प्रार्थना की।
'तुपकी' की सलामी बनी आकर्षण का केंद्र
रथयात्रा के दौरान बस्तर की अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा 'तुपकी' की सलामी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। बांस से बनाई गई विशेष नाल 'तुपकी' में पेंग (मलकांगनी) के बीज भरकर श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ को पारंपरिक सलामी दी।
तुपकी से निकलने वाली मधुर आवाज और श्रद्धालुओं के उत्साह से पूरा जगदलपुर भक्तिमय वातावरण में डूब गया। हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और रथयात्रा में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को मिल रहा संरक्षण
गोंचा पर्व बस्तर की प्राचीन लोक परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और धार्मिक उत्सवों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयासों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा रथयात्रा के साथ ही बस्तर के इस अनूठे और ऐतिहासिक लोक पर्व गोंचा का विधिवत समापन हुआ।











