
चंडीगढ़
शहर के डंपिंग ग्राउंड में कचरे के पहाड़ के साथ अब करोड़ों रुपये के खर्च का हिसाब भी जांच के दायरे में आ सकता है। पिछले पांच वर्षों में कचरे के प्रबंधन और निस्तारण पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है।
अब इस रकम के इस्तेमाल, कंपनियों को काम आवंटित करने की प्रक्रिया और भुगतान के तरीके को लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिकायत में टेंडर आवंटन में कथित अनियमितताओं और नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए गए हैं।
मामले में सीबीआइ की जांच का फोकस सरकारी धन के इस्तेमाल और ठेकों की प्रक्रिया पर रहने की संभावना है।
अब सीबीआई रखेगी पैनी नजर
शहर में प्रतिदिन सैकड़ों टन कचरा डंपिंग ग्राउंड पहुंचता है। इसके निस्तारण, सेग्रीगेशन और प्रबंधन के लिए नगर निगम ने अलग-अलग कंपनियों को काम सौंप रखा है। इसके अलावा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट का संचालन भी निजी कंपनी के माध्यम से किया जा रहा है।
इन कार्यों के लिए कंपनियों को प्रति टन के हिसाब से भुगतान किया जाता है। ऐसे में जांच का अहम बिंदु यह होगा कि ठेके की शर्तों के मुताबिक वास्तव में कितना काम हुआ और उसके बदले कितनी रकम जारी की गई।
नगर निगम में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट विंग भी बनाया गया है, जिसकी जिम्मेदारी इंजीनियरिंग विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी गई है। अब सवाल यह है कि इस व्यवस्था के तहत ठेकों की निगरानी किस स्तर पर हुई, काम की गुणवत्ता और मात्रा का सत्यापन कैसे किया गया और भुगतान से पहले किन दस्तावेजों के आधार पर मंजूरी दी गई।
सैनेटरी इंस्पेक्टर का रिश्वत मामला भी गरमाया
नगर निगम के सैनिटरी इंस्पेक्टर के पांच लाख रुपये की रिश्वत लेते पकड़े जाने के मामले के बाद डंपिंग ग्राउंड से जुड़े ठेकों और भुगतान व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, रिश्वत मामले और अन्य ठेकों में अनियमितताओं के आरोपों की अलग-अलग जांच और तथ्यों के आधार पर ही स्थिति स्पष्ट होगी।
एक ही काम के अलग-अलग रेट, भुगतान की जांच अहम
डंपिंग ग्राउंड में कचरे के निस्तारण से जुड़े कार्यों में कथित गड़बड़ियों को लेकर सबसे बड़ा सवाल अलग-अलग कंपनियों को दिए गए रेट पर है। आरोप हैं कि एक ही प्रकार के काम के लिए अलग-अलग दरों पर ठेके आवंटित किए गए। यदि काम की प्रकृति, मात्रा, तकनीकी शर्तों और अन्य परिस्थितियों में अंतर नहीं था, तो दरों में इस अंतर का आधार क्या था?
जांच में यह देखा जाना जरूरी होगा कि कंपनियों ने निर्धारित अवधि में कितना काम पूरा किया, कितनी मात्रा में कचरे का निस्तारण किया गया और भुगतान वास्तविक काम के अनुपात में हुआ या नहीं।
इसके लिए टेंडर दस्तावेज, वर्क ऑर्डर, बिल, माप पुस्तिकाएं, निरीक्षण रिपोर्ट और भुगतान संबंधी रिकॉर्ड अहम होंगे। यदि किसी कंपनी को किए गए काम से अधिक भुगतान हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्य जरूरी होंगे।
बिना अनुभव वाली कंपनियों को ठेके देने पर सवाल
नगर निगम की टेंडर प्रक्रिया पर दूसरा सवाल उन कंपनियों को काम सौंपने को लेकर है, जिनके पास कथित तौर पर कचरा प्रबंधन या निस्तारण का पर्याप्त अनुभव नहीं था। आरोप हैं कि कुछ कंपनियां काम अधूरा छोड़कर चली गईं। इसके बाद निगम को संबंधित कंपनियों पर पेनल्टी लगाने की कार्रवाई करनी पड़ी।
ऐसे मामलों में जांच का विषय होगा कि टेंडर की पात्रता शर्तें क्या थीं, कंपनियों ने अनुभव और तकनीकी क्षमता से संबंधित कौन से दस्तावेज जमा किए और चयन के समय उनका सत्यापन किया गया या नहीं।
साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि काम अधूरा छोड़ने वाली कंपनियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई हुई या नहीं और पेनल्टी की रकम वास्तव में वसूल की गई या नहीं।
डंपिंग ग्राउंड में कचरे का लगातार जमा होना, उसके निस्तारण पर भारी खर्च और ठेकों को लेकर उठते सवाल नगर निगम की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करते हैं।
यदि रिकॉर्ड की जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित अधिकारियों और कंपनियों की भूमिका स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल आरोपों की पुष्टि जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही होगी।











