शेयर बाजार में 25 साल बाद सबसे लंबी गिरावट, 8 हफ्ते में ₹26 लाख करोड़ स्वाहा

मुंबई
भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों इंडेक्स ने लगातार 8वें हफ्ते गिरावट दर्ज की है। यह करीब 25 वर्षों में सबसे लंबा गिरावट का दौर है। इस गिरावट के चलते 8 हफ्ते में निवेशकों के करीब ₹26 लाख करोड़ डूब गए। यह लगातार गिरावट 2020 में कोविड-19 क्रैश और 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौर से भी लंबी है।
अकेले इस सप्ताह निफ्टी में करीब 3.1 प्रतिशत और सेंसेक्स में करीब 2.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। सितंबर में भी सेंसेक्स-निफ्टी में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई थी। बता दें आज 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर घरेलू शेयर बाजार बंद है। इससे पहले 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570 अंक टूटकर 71,909 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 198 अंक गिरकर 22,421 पर।
बाजार में गिरावट कितनी बड़ी?
आठ हफ्तों की लगातार गिरावट में निफ्टी करीब 8.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 8.4 प्रतिशत नीचे आ चुका है। अंकों के लिहाज से देखें तो सेंसेक्स पिछले आठ हफ्तों में 6,590 अंक टूटा। जबकि, निफ्टी में 2,149 अंक की गिरावट आई। इस दौरान बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 26 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा घटा और 467 लाख करोड़ रुपये के नीचे आ गया।
4 दिन में FII ने निकाले करीब 35 हजार करोड़
बाजार पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली का है। 1 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयरों में करीब 9,484 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की।
इससे पिछले चार ट्रेडिंग सेशन में उनकी कुल बिकवाली करीब 34,965 करोड़ रुपये पहुंच गई। इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 1 अक्टूबर को करीब 10,042 करोड़ रुपये की खरीदारी कर बाजार को सहारा देने की कोशिश की।
सितंबर में भी विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार के खिलाफ रहा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में FPI की इक्विटी बिकवाली करीब 46 हजार करोड़ रुपये रही।
क्यों बेच रहे हैं विदेशी निवेशक?
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल: विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे एक साथ कई वैश्विक संकेत काम कर रहे हैं। पहला कारण अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल है। अमेरिकी 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5.33-5.34 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। यह 2002 के बाद का ऊंचा स्तर है। 30 साल की यील्ड भी करीब 5.68 प्रतिशत तक पहुंची।
बॉन्ड यील्ड क्यों है शेयर बाजार के लिए खतरा?
बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड की कीमत उलटी दिशा में चलते हैं। यील्ड बढ़ने का मतलब है कि बॉन्ड की कीमत गिर रही है और निवेशक बॉन्ड बेच रहे हैं। जब सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर ऊंची हो जाती है, तो निवेशकों के लिए कम जोखिम वाला डेट मार्केट ज्यादा आकर्षक हो जाता है। इससे शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले निवेश पर दबाव बढ़ता है।
बाजार पर कच्चे तेल का भी दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारतीय बाजार के लिए चिंता बढ़ा रही है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में महंगा तेल आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकता है। 1 अक्टूबर को ग्लेाबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर रहा। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई को लेकर चिंता ने कीमतों को बढ़ा दिया है।
कमजोर रुपया भी कर रहा परेशान
डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। 1 अक्टूबर को रुपया करीब 0.5 प्रतिशत कमजोर होकर 96.31 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह दो महीने का निचला स्तर है। कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय एसेट्स से मिलने वाले डॉलर रिटर्न को प्रभावित कर सकता है। साथ ही महंगे तेल और कमजोर रुपये का असर घरेलू महंगाई पर भी पड़ सकता है।
अब बाजार के लिए सबसे बड़े संकेत क्या होंगे?
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से 4 चीजों पर रहेगी। पहला, FII की बिकवाली रुकती है या नहीं। दूसरा, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड किस दिशा में जाती है? तीसरा, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के आसपास रहती है या घटती है और चौथा, रुपया डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर के आसपास टिकता है या और कमजोर होता है?











