
चंडीगढ़
राज्यसभा के नवनिर्वाचित सदस्य संजय भाटिया कॉलेज समय से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। इसके बाद भाजपा में सक्रिय रूप से काम किया। वे 2019 के लोकसभा चुनाव में करनाल से जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे। उनकी यह देश की दूसरी बड़ी जीत थी। वे 2024 में लोकसभा से हटकर संगठन में सक्रिय हो गए थे। केंद्रीय नेतृत्व ने उनको बिहार और अन्य प्रदेशों के चुनाव में आगे रखा। वे जीटी बेल्ट के पंजाबी चेहरों में सबसे ऊपर हैं। प्रदेश के साथ केंद्रीय संगठन में भी उनकी मजबूत पकड़ है।
संजय भाटिया मूल रूप से पानीपत उरलाना गांव से हैं। वे गांव से कई वर्ष पहले मॉडल टाउन में आकर बस गए थे। उनका जन्म 29 जुलाई 1967 पानीपत में हुआ। वे बीकॉम की पढ़ाई के बाद सामाजिक कार्यों में आगे रहे। उनके पिता जय दयाल भाटिया और मां चंद्र कांता भाटिया हैं। उनकी पत्नी अंजू भाटिया गृहिणी हैं। बड़े बेटे चांद भाटिया सामाजिक कार्यों में आगे रहते हैं।
संजय भाटिया कॉलेज समय से राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने आईबी पीजी कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई की। वे एबीवीपी के 1987 में मंडल सचिव और 1989 में जिला महासचिव बने। उनको 1998 में भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश महासचिव बनाया गया। उन्होंने नगर परिषद में पार्षद का चुनाव भी लड़ा था। हरियाणा खादी और ग्राम उद्योग बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे हैं। वे राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पार्टी के कार्यों और संसदीय गतिविधियों में सक्रिय हैं।
राजनीति में लगातार सक्रिय रहे
संजय भाटिया ने 2019 में लोकसभा चुनाव में करनाल लोकसभा क्षेत्र लड़ा था। उन्होंने कांग्रेस के कुलदीप शर्मा को 6,89,668 वोटों से हराया था। उनको 9,11,594 वोट मिले थे। यह उनकी देश की दूसरी बड़ी जीत थी। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मनोहर लाल को करनाल लोकसभा का टिकट दिया था। वे इसके बाद भाजपा के केंद्रीय संगठन में सक्रिय हो गए थे। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के लिए भी उनका नाम चर्चाओं में आया था।
जीटी बेल्ट का बड़ा पंजाबी चेहरा
संजय भाटिया भाजपा में जीटी रोड बेल्ट के बड़े पंजाबी चेहरे हैं। संजय भाटिया का 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट कट गया था। इसके बाद प्रदेशाध्यक्ष के लिए भी नाम चला था। हालांकि भाजपा ने किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया। इसके बाद इस वर्ग के लोगों में कहीं न कहीं पंजाबियों को पीछे धकेलने की बात मन में आती थी। इन सारी दुश्वारियों के बावजूद संजय भाटिया संगठन में केंद्रीय नेतृत्व के साथ मिलकर काम करते रहे।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भी वह करीबी हैं। ऐसा माना जा रहा है कि संगठन उनको राज्यसभा में भेजकर पंजाबी बिरादरी के बीच अपनी पैठ को मजबूत करना चाह रहा है। पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पंजाबी चेहरे के रूप में संजय भाटिया का उपयोग किया जा सकता है। भाटिया के विपक्षी नेताओं के साथ भी संबंध हैं। भाजपा ने इन सभी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भाटिया को मैदान में उतारा।
कांग्रेस में क्राॅस वोटिंग, भाजपा की रणनीति भी नाकाम
हरियाणा के राज्यसभा चुनाव में नतीजे भले ही साफ दिखे, लेकिन अंदर की कहानी बेहद रोमांचक रही। चुनाव के दौरान खेल कुछ ऐसा रचा गया कि आखिरी पलों तक सस्पेंस बना रहा। अंत में कांग्रेस के करमवीर बौद्ध और बीजेपी के संजय भाटिया जीत गए, मगर भाजपा दूसरी सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल को जीत के मुहाने पर लाकर चूक गई।
कांग्रेस को क्यों लगा झटका
राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को भी काफी बड़ा झटका लगा है। चुनाव से पहले एकजुटता का दावा करने वाली कांग्रेस के पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है, जबकि चार वोट अमान्य पाए गए। कांग्रेस ने फिलहाल क्रॉस वोटिंग करने वाले नामों का खुलासा नहीं किया है। इतना जरूर कहा है कि उन्हें पता है कि किन विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है उनके खिलाफ जल्द ही कार्रवाई की जाएगी।
जीत के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने बीजेपी पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, बीजेपी ने वोट चोरी के हर हथकंडे अपनाए, लेकिन हमारे विधायक उनके झांसे में नहीं आए। यह वोट चोरी की हार है। हुड्डा ने यह भी आरोप लगाया कि रिटर्निंग अधिकारी ने पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया।
अब भाजपा के चार और कांग्रेस के पास एक सांसद
इस चुनाव के बाद हरियाणा से राज्यसभा की पांच सीटों में से अब चार पर भाजपा और एक सीट पर कांग्रेस है। भाजपा के तीन सांसद संजय भाटिया, रेखा शर्मा और सुभाष बराला है, जबकि कार्तिकेय शर्मा समर्थित हैं। वहीं, अब कांग्रेस के भी हरियाणा से एक सांसद कर्मवीर बौद्ध हो गए है।
भजपा कैसे चूकी दूसरी सीट पर
1 इनेलो से तालमेल नहीं बना पाई
भाजपा इनेलो के विधायकों को अपने पक्ष में लाने में असफल रही। अगर ये 2 वोट मिल जाते तो नतीजा अलग होता।
2. अपना एक वोट बचा नहीं सकी
भाजपा का एक वोट रद्द होना सीधे तौर पर नुकसानदायक साबित हुआ। इतने करीबी मुकाबले में एक वोट भी भारी पड़ता है।
3. निर्दलीय उम्मीदवार के लिए पर्याप्त मैनेजमेंट नहीं
सतीश नांदल को जिताने के लिए जरूरी अतिरिक्त वोटों की व्यवस्था नहीं हो सकी।
4. कांग्रेस के वोट तोड़े, लेकिन पूरी तरह नहीं
हालांकि कांग्रेस के कुछ वोट टूटे, लेकिन बीजेपी उन्हें निर्णायक बढ़त में नहीं बदल पाई।
5. कानूनी रणनीति सफल नहीं हुई
भरत सिंह बेनीवाल का वोट रद्द कराने की कोशिश की गई, लेकिन यह दांव नहीं चला। अगर यह वोट रद्द हो जाता तो परिणाम बदल सकता था।
ऐसी जीती भाजपा-कांग्रेस
हरियाणा में कुल विधायक: 90
इनेलो के वोट (जो नहीं डाले गए) : 2
कुल वोट डाले गए : 88
सही (वैध) वोट: 83
गलत (रद्द) वोट: 5
4 कांग्रेस के, एक भाजपा का (मतलब 5 वोट खराब हो गए, जिनका कोई फायदा नहीं मिला।)
जीत के लिए कितना चाहिए था?
राज्यसभा चुनाव में हर वोट की कीमत 100 मानी जाती है।
83 वोट × 100 = 8300
अब इसे 3 से बांटते हैं (क्योंकि 2 सीटें हैं, तो +1 करके 3)
8300 ÷ 3 + 1 = 2767
यानी जीतने के लिए किसी को 2767 “वोट वैल्यू” चाहिए थी।
पहला उम्मीदवार: संजय भाटिया (बीजेपी)
उन्हें 39 वोट मिले
39 × 100 = 3900
ये 2767 से काफी ज्यादा है, इसलिए वो आराम से जीत गए।
उनके पास 1133 वोट ज्यादा बच गए (इसे सरप्लस कहते हैं)
अब असली मुकाबला (दूसरी सीट का खेल)
कांग्रेस उम्मीदवार: करमवीर बौद्ध
वोट मिले: 28
28 × 100 = 2800
बीजेपी समर्थित निर्दलीय: सतीश नांदल
पहले वोट: 16
16 × 100 = 1600
फिर भाटिया के बचे हुए (सरप्लस) वोट मिले: 1133
कुल: 1600 + 1133 = 2733
आखिर में कौन जीता
करमवीर बौद्ध: 2800
सतीश नांदल: 2733











