राज्यहरियाणा

फसल बीमा से किसानों का मोहभंग: रबी पंजीकरण में 10% की गिरावट, जानिए कारण

चरखी दादरी
 हरियाणा में किसानों का भरोसा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से लगातार कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। रबी सीजन 2025-26 के लिए पंजीकरण प्रक्रिया पूरी होने के बाद सामने आए ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के 16 प्रमुख कृषि जिलों में बीमित किसानों की संख्या और बीमित रकबे में औसतन 8 से 10 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।

खासतौर पर दक्षिण और पश्चिम हरियाणा के जिलों में यह रुझान ज्यादा स्पष्ट है। कृषि विभाग के संकलित आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन में बीमित किसानों की कुल संख्या ही नहीं घटी, बल्कि बीमित क्षेत्रफल भी घटा है। पहले केसीसी धारकों के लिए बीमा अनिवार्य होने के चलते आंकड़े ऊंचे रहते थे, लेकिन योजना के स्वैच्छिक होने के बाद बड़ी संख्या में किसानों ने बैंक जाकर लिखित में बीमा से बाहर होने का विकल्प चुना है।

हालांकि कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि 31 जनवरी तक पंजीकरण का समय था। बैंकों द्वारा अंतिम डेटा अपलोड होने के बाद इन आंकड़ों में 1-2 प्रतिशत का सुधार हो सकता है।

टाप जिले उठा रहे बीमा का आधे से ज्यादा भार

कृषि विभाग की ओर से जो प्रारंभिक रिपोर्ट मुख्यालय भेजी गई है उसमें 16 जिलों के कुल बीमित किसानों में से लगभग 50% किसान सिर्फ चार जिलों सिरसा, भिवानी, हिसार और कैथल से हैं। इसी तरह, कुल बीमित रकबे का 50% से अधिक हिस्सा भी इन्हीं जिलों में केंद्रित है। इससे संकेत मिलता है कि योजना का दायरा पूरे प्रदेश में समान रूप से नहीं फैल पा रहा।

नये बने जिले हांसी में भी नहीं बदले समीकरण
23वें जिले हांसी में कुल बीमित किसान 12,480 और बीमित क्षेत्र 38,900 एकड़ ही दर्ज हुआ। यह हिस्सा कुल आंकड़ों में 5% से भी कम है। इससे स्पष्ट है कि प्रशासनिक पुनर्गठन के बावजूद बीमा योजना के प्रति उत्साह नहीं बन पाया।

फसल पैटर्न भी तय कर रहा बीमा रुझान
करनाल, कुरुक्षेत्र और यमुनानगर जैसे जिलों में बासमती और गन्ने का रकबा अधिक होने के कारण गेहूं आधारित रबी बीमा में स्वाभाविक रूप से रुचि कम रही। आंकड़े बताते हैं कि जहां फसल विविधता अधिक है, वहां बीमा भागीदारी अपेक्षाकृत कम दर्ज हुई।

कम प्रीमियम, फिर भी दूरी बना रहे किसान
रबी फसलों के लिए 1.5% प्रीमियम दर होने के बावजूद अधिकांश जिलों में 8-10% तक की गिरावट दर्ज हुई। आंकड़े संकेत देते हैं कि समस्या प्रीमियम की नहीं, बल्कि क्लेम भुगतान की प्रक्रिया और समयबद्धता से जुड़ी है।

जानें अब आगे क्या…

क्लेम प्रकिया समझाने को जागरूकता कैंप लगाएंगे कृषि विभाग के अधिकारी मानते हैं कि स्वैच्छिक विकल्प के कारण संख्या कम हुई है। विभाग अब ग्राम स्तर पर शिविर लगाकर किसानों को क्लेम प्रक्रिया के प्रति जागरूक करने की योजना बना रहा है।

क्यों पीछे हट रहे किसान
    क्लेम प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव:किसानों का आरोप है कि नुकसान का पटवारी और कंपनी द्वारा किया जाने वाला सर्वे धरातल के बजाय कागजों पर ज्यादा होता है।

    प्रीमियम कटा, पर मुआवजा नहीं: ‘मेरी फसल-मेरा ब्योरा’ और बीमा पोर्टल के बीच डेटा मिसमैच होने के कारण कई किसानों का प्रीमियम कटने के बावजूद क्लेम से वंचित रहते हैं। 

    सैटेलाइट डेटा बनाम जमीनी हकीकत अलग:कृषि विभाग अब नुकसान के आकलन के लिए सैटेलाइट तस्वीरों का सहारा ले रहा है, जबकि किसानों का तर्क है कि ओलावृष्टि या स्थानीय जलभराव जैसी स्थिति सैटेलाइट में स्पष्ट नहीं होती।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button